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उत्तराखण्ड के महत्त्वपूर्ण डाक टिकट

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साल 1965 में भारत रत्न उपाधि से विभूषित पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1966 में स्वामी रामतीर्थ का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1967 में भारतीय सर्वेक्षण विभाग को 200 वर्ष पूर्ण करने पर भारतीय सर्वेक्षण विभाग का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1970 में स्वामी श्रद्धानंद का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1975 में राज्य पक्षी मोनाल का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1976 में प्रसिद्ध पर्यावरण प्रेमी जिम कार्बेट  का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1977 में राज्य वृक्ष बुरांश का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1982 में स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1982 में राज्य पुष्प ब्रह्मकमल का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1983 में गोमुख का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1986 में कार्बेट नेशनल पार्क का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1989 में बद्रीनाथ धाम के संस्थापक आदि गुरु शंकराचार्य का चित्र डाक टिकट पर छापा गया था. साल 1991 में शांतिकुंज, हरिद्वार के ...

GARIYA BAGWAL (गढ़िया बग्वाल)

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आज मैं आपको उत्तराखण्ड के बागेश्वर जनपद स्थित कपकोट के ‘गढ़िया परिवार’ के लोगों द्वारा मनाया जाने वाला एक ऐसे त्यौहार के बारे में जानकारी दे रहा हूँ जिसे सिर्फ ‘गढ़िया परिवार’ के लोग ही मनाते हैं। ‘गढ़िया’ लोगों का मूल गाँव पोथिंग (कपकोट ) है।  यहीं से गढ़िया परिवार के लोग अन्य गांवों (जैसे – गड़ेरा, तोली, कपकोट, लीली, लखमारा, डॉ, फरसाली आदि) में चले गए और साथ ले गए तो अपना यह पारवारिक पर्व। इस पर्व को लोग ‘गढ़िया बग्वाल’/ ‘गढ़िया बग्वाव’ के नाम से जानते हैं। आज भी यह पर्व गढ़िया परिवार के लोगों द्वारा बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यदि आपके पास इस त्यौहार से सम्बंधित कोई जानकारी हो तो कृपया बाँटने का कष्ट करें। यूँ तो उत्तराखण्ड में अनेक लोक पर्व/त्यौहार मना ये जाते जो कृषि या उनके पशुधन से सम्बंधित होते हैं और इन पर्वों को क्षेत्र के समस्त लोग बड़े हर्ष एवं उल्लास के साथ मानते हैं। लेकिन उत्तराखण्ड में बागेश्वर जिले के कपकोट  क्षेत्र में एक ऐसा त्यौहार भी मनाया जाता है, जिसे सिर्फ ‘गढ़िया परिवार’ के लोग मानते हैं। और यह त्यौहार ‘गढ़िया बग्वाल’ के नाम से जाना जाता है। बागेश्वर या ...

गढ़िया वंश का इतिहास

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 नमस्कार दोस्तों                आज मैं आपको एक "गढ़िया वंश" के  इतिहास के बारे में बताने जा रहा हूं.  आइए जानते है कैसे गढ़िया वंश का उदय और विकास हुआ.         बात उन दिनों की है जब औरंगजेब का शासन था  देश मुगलों के अधीन था। पूरे देश में मुगलों का शासन था उनके अत्याचार पूरे देश में फैले थे। औरंगजेब ने बहुत अत्याचार किये और बहुत राजाओ को हराकर उनका राज्य अपने राज्य में मिला दिया। उन दिनों गढिया जाति  के लोग राजस्थान में रहते थे। तब वहा औरंगजेब के अत्याचारो के कारण  मजबूरन उनको वहा से पलायन करना पड़ा फिर वहा से  पलायन के पश्चात वे अस्कोट नामक स्थान पर बस गए जो की वर्तमान में पिथौरागढ़ जनपद में है। वह समय ताकत का था उस दौरान जिसके ज्यादा बच्चे होते थे उसका ज्यादा प्रभाव रहता था मतलब यूँ की जिसके ज्यादा लड़के होते थे उसकी ज्यादा शक्तिशाली या प्रभावशाली माना जाता था फिर उन्होंने वहा से भी पलायन किया और तुर्ती (गढ़वाल) में बस जाते हैं जो वर्तमान में उत्तराखंड के चमोली जनपद में स्थित है वहाँ उन्होंने...